उत्तर नारी डेस्क
विवरण :
कई वर्षों के लंबे संघर्षों के बाद उत्तराखंड का निर्माण 9 नवम्बर 2000 को एक अलग राज्य के रूप में हुआ।
तस्वीर :
9 नवम्बर 2000 को उत्तराखण्ड के कई क्रान्तिकारियों द्वारा किये गए अथक प्रयासों से उत्तराँचल का नाम उत्तराखण्ड पड़ा या यूँ कह लीजिए कि पहाड़वासियों के द्वारा दिए गए बलिदान से उत्तराखंड एक अलग राज्य बना। तो आज हम आपको बताएंगे सन् 1979 से लेकर सन् 2000 तक की कहानी और साथ ही बताएंगे आपको की आख़िर क्यों 9 नवम्बर को उत्तराखण्ड स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता हैं।
25 जुलाई 1979 को मसूरी में एक पृथक पर्वतीय राज्य की अवधारणा के साथ एक पार्टी का गठन हुआ, जिसका नाम था उत्तराखण्ड क्रान्ति दल। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल की स्थापना उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिलों से बने एक अलग राज्य निर्माण आन्दोलन हेतु 25 जुलाई 1979 को हुई। स्थापना सम्मेलन कुमाँऊ विश्वविद्यालय के भूतपूर्व उपकुलपति डा.डी.डी. पन्त की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के झण्डे तले अलग राज्य की मांग ने एक बड़े राजनैतिक संघर्ष और जन आन्दोलन का स्वरूप ले लिया और अन्ततः 9 नवम्बर 2000 को यह अपने उद्देश्य में सफल रहा। जब उत्तराखण्ड राज्य अस्तित्व मे आया तब उसका नाम उत्तरांचल था। जिसे बाद में 1 जनवरी 2007 को उत्तराखण्ड का नाम दिया गया। काशी सिंह ऐरी के युवा नेतृत्व के अन्तर्गत राज्य के प्रथम विधान सभा चुनाव 2002 में पार्टी को 70 सीटों में से 04 सीटों पर जीत हासिल हुई।
पार्टी के प्रमुख नेताओं या बड़े चेहरों की बात करें तो काशी सिंह ऐरी उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के प्रमुख नेता जो कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में तीन बार विधायक रहे, जिन्होंने उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के विधायक के रूप में प्रतिनिधित्व किया और प्रथम उत्तराखण्ड विधानसभा 2002 में विधायक और उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के अध्यक्ष भी रहे भुवन चन्द्र जोशी, बीना बहुगुणा, वरिष्ठ राज्य आन्दोलनकारी और उत्तराखण्ड राज्य के गठन में सबसे आगे से संघर्ष करने वाले उत्तराखण्ड राज्य निर्माण आंदोलन के प्रमुख चेहरे रहे जसवंत सिंह बिष्ट, विपिन चन्द्र त्रिपाठी, इन्द्रमणि बडौंनी जो अलग राज्य आन्दोलन के लिए उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के संस्थापक सदस्यों और लम्बे समय से राज्य आन्दोलनकारियों में से एक थे।
उत्तराखण्ड क्रान्ति दल राज्य में चुनावी लाभ और सरकारों के गठन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका बनाने में सफल रहा, परन्तु अलग राज्य आन्दोलन में देर से सक्रिय रहा परन्तु अलग राज्य आन्दोलन में देर से सक्रिय होने के बावजूद दोनों राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी द्वारा राज्य की राजनीति में सीमित कर दिया गया। अब तक उत्तराखण्ड क्रान्ति दल आन्तरिक विभाजन और गुटबाजी के कारण उत्तराखण्ड की राजनीति में एक व्यवर्हाय तीसरी शक्ति स्थापित करने के अपने मूल लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सका है। पार्टी पहाड़वासियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान की दिशा में अतीत में विभिन्न अभियानों में सक्रिय रही है। पार्टी ने यद्यपि एक रूपक और समावेशी मामलों में उत्तराखंडी पहचान को परिभाषित करने और उत्तराखण्ड में रहने वाले सभी लोगों की विविधता की चिंताओं को अपनाया है। इस रूप में इसकी तुलना जातिया क्षेत्रवाद की बजाय नागरिक क्षेत्रवाद की विचारधारा वाली स्काटिंश नेशनल पार्टी या प्लेड सायमु जैसी वामपंथी राष्ट्रवादी पार्टियों से इ़त्तर उत्तराखण्ड क्रान्ति दल की मूल अवधारणा और इसका लक्ष्य पूर्णरूप से गैर अलगाववादी है।
उत्तराखण्ड के अलग राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष करने वाला संगठन उत्तराखण्ड क्रान्ति दल अब अपने अस्तिव की लड़ाई लड़ रही है। 1994 में उत्तराखण्ड को उत्तर प्रदेश से अलग करने की मांग उक्रांद ने उठाई थी। उक्रांद का राजनैतिक असतित्व अब धसता नजर आ रहा था। पार्टी ने 2002 में पहले विधानसभा में 4 सीट पर जीत हासिल की थी तो 2007 में 3 सीट ही मिल पाई वहीं देखा गया की 2012 के चुनाव में महज 1 सीट ही मिल पाई। उक्रांद अब तक में पाँच बार बिखराव झेल चुकी है।
पहला बिखराब 1996 में दूसरा 2002 में तीसरी बार 2007 में चौथी बार 2011 में पाँचवी बार 2013 में हुआ। वर्ष 2011 में शुरू हुआ दल का विघटन अब चार खेमों में बटाँ है। दल के भीतर की सियासी जंग ने उसे हासिये पर खड़ा कर दिया है। वर्ष 2002 विधान सभा चुनाव के बाद पार्टी का ग्राफ लगातार गिर रहा है। दिसम्बर 2011 मेें पार्टी ने न केवल अपना नाम खो दिया, बल्कि चुनावी पहचान यानि चुनाव चिन्ह से भी हाथ धोना पड़ा। मौजूदा समय में पार्टी अपनी चुनाव आयोग से क्षेत्रीय दल की मान्यता तक खो चुकी है।


