उत्तर नारी डेस्क
सनातन धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता, बुद्धि और सिद्धि के दाता के रूप में पूजा जाता है। हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।
वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। गणेश उत्सव का समापन 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन के साथ होगा। पंचांग के अनुसार इस वर्ष चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह करीब 7:06 बजे शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह करीब 7:44 बजे समाप्त होगी।
आखिर क्यों विराजते हैं घर में गणपति?
गणेश स्थापना को लेकर सनातन परंपरा में अनेक धार्मिक कथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं। गणपति को बुद्धि, विवेक, ज्ञान, समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा इसी मान्यता से जुड़ी है कि उनके स्मरण से कार्यों में आने वाले विघ्न दूर होते हैं।
धार्मिक परंपरा में महर्षि वेदव्यास और भगवान गणेश से जुड़ी महाभारत लेखन की कथा भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि वेदव्यास ने महाभारत की कथा का उच्चारण किया और भगवान गणेश ने उसे लिपिबद्ध किया। इसी प्रसंग से गणेश जी के तप, एकाग्रता और ज्ञान से जुड़ी कई लोकमान्यताएं जुड़ी हुई हैं।
पार्थिव गणेश यानी मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा की पूजा की परंपरा भी प्राचीन धार्मिक परंपराओं में वर्णित है। गणेशोत्सव के बाद प्रतिमा का जल में विसर्जन सृष्टि के चक्र—निर्माण, स्थिति और पुनः प्रकृति में विलय—का प्रतीक माना जाता है।
2026 में कब है गणेश चतुर्थी?
- गणेश चतुर्थी: 14 सितंबर 2026, सोमवार
- चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 14 सितंबर, सुबह लगभग 7:06 बजे
- चतुर्थी तिथि समाप्त: 15 सितंबर, सुबह लगभग 7:44 बजे
- अनंत चतुर्दशी/मुख्य विसर्जन: 25 सितंबर 2026, शुक्रवार
समय शहर और स्थानीय पंचांग के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।
गणपति स्थापना और पूजा का शुभ मुहूर्त
गणेश चतुर्थी पर मध्याह्न काल में गणेश पूजा को विशेष शुभ माना जाता है। 2026 में दिल्ली के लिए गणेश पूजा का मध्याह्न मुहूर्त लगभग सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक बताया गया है। अन्य शहरों में स्थानीय सूर्योदय और पंचांग के अनुसार समय में अंतर हो सकता है।
इसलिए गणपति स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा के लिए अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग या विद्वान पंडित से मुहूर्त की पुष्टि करना उचित रहेगा।
गणेश पूजा में किन सामग्री की आवश्यकता होती है?
गणेश पूजन के लिए सामान्य रूप से इन सामग्रियों का उपयोग किया जाता है—
- गणेश जी की प्रतिमा
- चौकी या पाटा
- लाल वस्त्र
- कलश और जल
- पंचामृत
- रोली और अक्षत
- सिंदूर
- लाल चंदन
- मौली
- जनेऊ
- लाल पुष्प या माला
- दूर्वा
- नारियल
- फल
- पंचमेवा
- मोदक या लड्डू
- लौंग और इलायची
- धूप और अगरबत्ती
- घी का दीपक
- कपूर
पूजा सामग्री में स्थानीय परंपरा और परिवार की मान्यता के अनुसार बदलाव हो सकता है।
गणेश जी की पूजा कैसे करें?
सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करें। चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
इसके बाद संकल्प लेकर गणेश जी का आवाहन करें। प्रतिमा का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद भगवान गणेश को सिंदूर, लाल चंदन, अक्षत, मौली, जनेऊ, पुष्प और दूर्वा अर्पित करें।
गणेश जी को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं। फल, नारियल और पंचमेवा अर्पित करें। इसके बाद दीप, धूप और कपूर जलाकर आरती करें।
गणेश पूजा में दूर्वा और मोदक का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और परंपरा के अनुसार भगवान गणेश को विभिन्न प्रकार के नैवेद्य अर्पित करते हैं।
गणेश जी को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?
धार्मिक मान्यताओं में दूर्वा को भगवान गणेश का प्रिय माना गया है। गणेश पूजन में दूर्वा अर्पित करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। भक्त श्रद्धा के साथ दूर्वा अर्पित कर भगवान गणेश से सुख, शांति, बुद्धि और समृद्धि की कामना करते हैं।
अलग-अलग द्रव्यों से गणेश प्रतिमा बनाने की मान्यताएं
धार्मिक परंपराओं और लोकमान्यताओं में अलग-अलग पदार्थों से गणेश प्रतिमा बनाकर पूजा करने का उल्लेख मिलता है। इनमें मिट्टी, गुड़, हल्दी, गोबर, श्वेतार्क की जड़, नीम की लकड़ी, मक्खन और धान्य आदि से गणेश प्रतिमा बनाने की मान्यताएं शामिल हैं।
इन मान्यताओं को धार्मिक परंपरा और आस्था के रूप में देखा जाना चाहिए। इनके फल संबंधी दावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाता।
पार्थिव यानी मिट्टी के गणेश की पूजा को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। पर्यावरण की दृष्टि से भी प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमा का उपयोग और स्थानीय जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने वाली विसर्जन व्यवस्था अपनाना उचित है।
गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन क्यों वर्जित माना जाता है?
गणेश चतुर्थी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यताओं में से एक चंद्र दर्शन और कलंक की कथा है।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान गणेश को देखकर चंद्रमा ने उनका उपहास किया। इससे भगवान गणेश नाराज हुए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया। बाद में देवताओं के अनुरोध पर भगवान गणेश ने श्राप को सीमित कर दिया।
इसी मान्यता के कारण भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की रात चंद्रमा के दर्शन से बचने की परंपरा है। इसे कई स्थानों पर कलंक चतुर्थी भी कहा जाता है।
शास्त्रीय परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी स्यमंतक मणि की कथा को भी चतुर्थी के चंद्र दर्शन से जुड़े मिथ्या कलंक के संदर्भ में बताया जाता है।
यदि भूलवश चंद्रमा का दर्शन हो जाए तो विभिन्न परंपराओं में भगवान श्रीकृष्ण की स्यमंतक मणि कथा सुनने अथवा संबंधित मंत्र का जाप करने की मान्यता मिलती है।
गणेश चतुर्थी पर कौन-सा मंत्र पढ़ें?
गणेश पूजा के दौरान श्रद्धालु इस प्रसिद्ध मंत्र का जाप कर सकते हैं—
ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभकार्येषु सर्वदा॥
इसके अलावा गणपति अथर्वशीर्ष, गणेश स्तोत्र और गणेश चालीसा का पाठ भी श्रद्धा के अनुसार किया जाता है।
गणेश आरती
पूजा के अंत में भगवान गणेश की आरती की जाती है। आरती के दौरान परिवार के सभी सदस्य श्रद्धा से शामिल होकर भगवान गणेश से सुख-समृद्धि और विघ्नों के नाश की प्रार्थना करते हैं।
गणेश उत्सव का समापन कब होगा?
गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाला गणेशोत्सव कई परिवारों में डेढ़, तीन, पांच, सात या दस दिनों तक मनाया जाता है। सार्वजनिक और पारंपरिक दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी, 25 सितंबर 2026 को गणपति विसर्जन के साथ होगा।
विसर्जन के समय भक्त भगवान गणेश से अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हुए उन्हें विदाई देते हैं।
गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।

