उत्तर नारी डेस्क
प्रतिवर्ष 2 सितंबर को गढ़वाली भाषा दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक भाषा को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी माटी, अपनी जड़ों, अपने लोकजीवन और अपनी सांस्कृतिक पहचान को स्मरण करने का दिन है। गढ़वाली भाषा में हमारी माँ की लोरी है, दादी-नानी की कहानियाँ हैं, पहाड़ की पगडंडियों की खुशबू है और हमारे लोकगीतों की आत्मा बसती है। हमारे सुख-दुःख, रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार, लोककथाएँ, मुहावरे और कहावतें गढ़वाली भाषा के माध्यम से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी हम तक पहुँचे हैं। इसलिए गढ़वाली केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि गढ़वाल की आत्मा और हमारी अस्मिता की पहचान है।
आज बदलते समय के साथ गढ़वाली भाषा के सामने अनेक चुनौतियाँ खड़ी हैं। पलायन, शहरीकरण और हिंदी-अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव के कारण नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। कई बच्चे गढ़वाली को समझ तो लेते हैं, लेकिन उसे सहजता और गर्व के साथ बोल नहीं पाते। यही स्थिति भविष्य के लिए सबसे बड़ी चिंता है, क्योंकि कोई भाषा तब संकट में पड़ती है जब वह नई पीढ़ी के दैनिक जीवन से दूर होने लगती है। यदि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ गढ़वाली में बोलना, गाना और अपने भाव व्यक्त करना भूल गईं, तो केवल शब्द ही नहीं खोएँगे, बल्कि हमारे साथ लोकस्मृतियों का एक पूरा संसार भी धीरे-धीरे खो जाएगा।
गढ़वाली भाषा को बचाने के लिए हमें किसी बड़े अवसर की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। बच्चों से गढ़वाली में बात करें, उन्हें अपनी दादी-नानी की लोककथाएँ सुनाएँ, लोकगीतों से जोड़ें और अपनी भाषा बोलने पर गर्व करना सिखाएँ। विद्यालयों और महाविद्यालयों में गढ़वाली साहित्य, लोकसंस्कृति और भाषा पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ तथा डिजिटल माध्यमों के जरिए इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। आइए, गढ़वाली भाषा दिवस पर हम सब यह संकल्प लें कि अपनी भाषा को केवल स्मृतियों और मंचों तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि उसे अपने घरों और अपने जीवन में जीवित रखेंगे।
क्योंकि जब अपनी भाषा जीवित रहती है, तभी अपनी संस्कृति मुस्कुराती है; और जब अपनी संस्कृति जीवित रहती है, तभी हमारी पहचान सुरक्षित रहती है।
“अपणी भाषा, अपणी माटी—यै छन हमारि असली थाती।”
(डॉ. शोभा रावत
असिस्टेंट प्रोफेसर
हिंदी विभाग
राजकीय महाविद्यालय कल्जीखाल पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड)

