उत्तर नारी डेस्क
उत्तराखण्ड के पहाड़ी गांवों में स्कूल तक पहुंचने के लिए बच्चों को अक्सर लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। दुर्गम रास्ते, खड़ी चढ़ाई और परिवहन के सीमित साधन खासकर बेटियों की पढ़ाई के सामने बड़ी चुनौती बन जाते हैं। कई छात्राओं को आगे की शिक्षा के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता है, लेकिन साइकिल या दोपहिया वाहन चलाना न आने के कारण उनके लिए सफर आसान नहीं होता। इसी परेशानी को समझते हुए पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट स्थित राजकीय इंटर कॉलेज (जीआईसी) भूलीगांव के शिक्षकों ने एक अनूठी पहल शुरू की है। यहां छात्राओं को पढ़ाई के साथ-साथ साइकिल चलाना भी सिखाया जा रहा है, ताकि वे भविष्य में अपनी राह खुद तय करने के लिए अधिक आत्मविश्वास हासिल कर सकें।
जीआईसी भूलीगांव स्कूल में छात्राओं को साइकिल चलाने का प्रशिक्षण
गंगोलीहाट के दूरस्थ क्षेत्र में स्थित जीआईसी भूलीगांव में छात्राएं इन दिनों साइकिल चलाना सीखने में जुटी हैं। खास बात यह है कि इसके लिए छात्राएं स्कूल की छुट्टी के बाद नहीं, बल्कि सुबह कक्षाएं शुरू होने से पहले ही पहुंच जाती हैं। कई छात्राएं रोजाना निर्धारित समय से करीब आधा घंटा से एक घंटा पहले स्कूल आकर अभ्यास करती हैं।
स्कूल के प्रभारी प्रधानाचार्य आनंद मेहरा के नेतृत्व में शुरू हुई इस पहल का उद्देश्य छात्राओं को एक ऐसा कौशल सिखाना है, जो आगे चलकर उनकी पढ़ाई और आवागमन में मददगार साबित हो सकता है। शिक्षकों का मानना है कि कम उम्र में साइकिल चलाना सीखने से लड़कियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा और भविष्य में उन्हें स्कूटी या अन्य दोपहिया वाहन चलाने में भी आसानी होगी।
अंग्रेजी का एक पाठ बना साइकिल सिखाने की प्रेरणा
जीआईसी भूलीगांव में बालिकाओं को साइकिल सिखाने का विचार अचानक नहीं आया। इसकी शुरुआत कक्षा 11 की अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तक के एक अध्याय से हुई। प्रभारी प्रधानाचार्य आनंद मेहरा विद्यार्थियों को 'द समर ऑफ ए ब्यूटीफुल व्हाइट हॉर्स' (The Summer of a Beautiful White Horse) पाठ पढ़ा रहे थे। इस दौरान घुड़सवारी का उल्लेख आया, जिससे उनके मन में पहाड़ के बच्चों के लिए उपयोगी कौशल सिखाने का विचार पैदा हुआ।
आनंद मेहरा ने महसूस किया कि आज के समय में पहाड़ी क्षेत्र के विद्यार्थियों के लिए घुड़सवारी की तुलना में साइकिल चलाना सीखना अधिक व्यावहारिक हो सकता है। खासकर छात्राओं के लिए यह कौशल आगे की पढ़ाई के दौरान काफी उपयोगी साबित हो सकता है।
प्रधानाचार्य के अनुसार, कई बार लड़कियां बड़ी होने के बाद साइकिल या दोपहिया वाहन चलाना सीखने में संकोच महसूस करती हैं। यदि उन्हें स्कूल के दिनों में ही इसका अभ्यास करने का अवसर मिले, तो वे भविष्य में गांव से बाहर पढ़ाई करने जाने पर अधिक सहज महसूस कर सकती हैं।
शिक्षकों ने आपस में पैसे जुटाकर खरीदीं चार साइकिलें
इस पहल को शुरू करने के लिए स्कूल के शिक्षकों और कर्मचारियों ने मिलकर आर्थिक सहयोग किया। सभी ने आपसी योगदान से चार साइकिलें खरीदीं, जिनकी मदद से छात्राओं को अभ्यास कराया जा रहा है।
स्कूल में छात्राओं की संख्या और उपलब्ध साइकिलों को ध्यान में रखते हुए अभ्यास की व्यवस्था बनाई गई है। इसके लिए विद्यालय में बनाए गए छह सदनों के अनुसार छात्राओं को बारी-बारी से साइकिल चलाने का अवसर दिया जाता है। इससे सीमित संसाधनों के बावजूद अधिक से अधिक छात्राओं को प्रशिक्षण देने की कोशिश की जा रही है।
शिक्षकों की यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहाड़ के कई गांवों में साइकिल चलाने के लिए उपयुक्त रास्ते आसानी से उपलब्ध नहीं होते। ऊबड़-खाबड़ मार्गों और खड़ी चढ़ाई के कारण बच्चों को इसका अभ्यास करने का मौका कम मिलता है।
उत्तराखण्ड में कक्षा 9 की छात्राओं को साइकिल के लिए मिलते हैं 2,850 रुपये
उत्तराखण्ड सरकार की ओर से कक्षा नौ में पढ़ने वाली छात्राओं को साइकिल खरीदने के लिए 2,850 रुपये की आर्थिक सहायता दिए जाने का प्रावधान है। जीआईसी भूलीगांव के शिक्षकों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में सड़क और रास्तों की स्थिति अनुकूल है, वहां साइकिल चलाना सीख चुकी छात्राएं इसका उपयोग स्कूल आने-जाने के लिए भी कर सकती हैं।
हालांकि, पहाड़ी क्षेत्रों में हर जगह साइकिल से सफर करना आसान नहीं है। कई इलाकों में रास्तों की बनावट और चढ़ाई इसके इस्तेमाल को सीमित कर देती है। इसके बावजूद साइकिल चलाना सीखने से छात्राओं को एक नया कौशल मिलेगा, जो आगे चलकर उनके लिए उपयोगी हो सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर लड़कों को बड़े होने पर दोपहिया वाहन चलाना सीखने के अधिक अवसर मिल जाते हैं, जबकि कई लड़कियां इससे वंचित रह जाती हैं। जीआईसी भूलीगांव का प्रयास इसी अंतर को कम करने की दिशा में एक कदम है।
पढ़ाई के साथ खेलों में भी आगे बढ़ रही हैं स्कूल की छात्राएं
जीआईसी भूलीगांव में शिक्षकों की कोशिशें केवल साइकिल चलाने का प्रशिक्षण देने तक सीमित नहीं हैं। विद्यालय में छात्राओं को खेलकूद और अन्य गतिविधियों में आगे बढ़ने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।
स्कूल की बालिका वॉलीबॉल टीम ने जिला स्तरीय प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन करते हुए राज्य स्तर की प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई किया है। छात्राओं की वॉलीबॉल में रुचि को देखते हुए शिक्षकों ने नियमित अभ्यास की व्यवस्था की और सुबह के समय मैदान में उन्हें प्रशिक्षण दिया।
लगातार अभ्यास और शिक्षकों के मार्गदर्शन का सकारात्मक परिणाम सामने आया। अब विद्यालय की छात्राएं प्रदेश स्तर पर होने वाली प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए तैयार हैं।
शिक्षकों के सहयोग से स्कूल परिसर में बने मंच पर होते हैं कार्यक्रम
विद्यालय के विकास के लिए भी शिक्षकों ने मिलकर प्रयास किए हैं। स्कूल परिसर को आकर्षक बनाने के उद्देश्य से झाड़ियों की मदद से वहां 'जीआईसी भूलीगांव' लिखा गया है।
इसके अलावा, शिक्षकों ने आपसी सहयोग से करीब 2.50 लाख रुपये एकत्र कर विद्यालय में एक रंगमंच तैयार कराया। इस मंच का उपयोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों और स्कूल की अन्य गतिविधियों के आयोजन के लिए किया जाता है।
विद्यालय में उपलब्ध सीमित संसाधनों के बीच शिक्षकों का यह सामूहिक प्रयास विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ खेल, संस्कृति और अन्य रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने में मदद कर रहा है।
जनप्रतिनिधियों और शिक्षा विभाग ने की पहल की सराहना
जीआईसी भूलीगांव में छात्राओं को साइकिल चलाना सिखाने और उनके सर्वांगीण विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों की विभिन्न स्तरों पर सराहना हुई है। विधायक फकीर राम टम्टा, मुख्य शिक्षा अधिकारी तरुण पंत और पूर्व विधायक मीना गंगोला सहित कई लोगों और संगठनों ने विद्यालय की इस पहल की प्रशंसा की है।
पहाड़ के दूरस्थ इलाकों में जहां संसाधनों की कमी के कारण विद्यार्थियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, वहां शिक्षकों की ऐसी कोशिशें छात्राओं को नए अवसर देने का काम कर रही हैं।
जीआईसी भूलीगांव की यह पहल बताती है कि स्कूलों में शिक्षा का अर्थ केवल किताबों तक सीमित नहीं है। यदि विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ जरूरी व्यावहारिक कौशल और आगे बढ़ने के अवसर मिलें, तो वे भविष्य की चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास के साथ कर सकते हैं। साइकिल चलाना सीख रहीं ये छात्राएं इसी दिशा में एक नई शुरुआत कर रही हैं।




