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उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक धरोहर, पहाड़ों की खास होली

 उत्तर नारी डेस्क 


उत्तराखण्ड के कुमाऊं अंचल में मनाई जाने वाली कुमाऊंनी होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है। यह पहाड़ों की आत्मा का उत्सव है। यहां होली खेली नहीं जाती, बल्कि गाई जाती है, जी जाती है, और महसूस की जाती है।

जहां मैदानी इलाकों में होली दो-तीन दिनों में सिमट जाती है, वहीं कुमाऊं में यह कई हफ्तों तक चलने वाला सांस्कृतिक अनुष्ठान बन जाती है। एक ऐसा उत्सव जिसमें सुर, श्रद्धा और सामूहिकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।


Vasant Panchami से होती है कुमाऊंनी होली की शुरुआत

कुमाऊंनी होली की शुरुआत वसंत पंचमी से मानी जाती है। जैसे ही बसंत की पहली आहट पहाड़ों को छूती है, वैसे ही गांवों में होली के राग गूंजने लगते हैं।

सर्द हवाओं के बीच जब कोई स्वर उठता है—

"आज ब्रज में होली रे रसिया…"

तो लगता है जैसे प्रकृति स्वयं संगत कर रही हो।

रंगों की असली शुरुआत उस दिन मानी जाती है जब सबसे पहले भगवान को अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है। यह परंपरा इस उत्सव को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करती है-पहले ईश्वर, फिर समाज।

कुमाऊं में होली का शुभारंभ मंदिर से होता है। देवालय में बैठकर राग-रागिनियों में होली गाई जाती है, फिर वही स्वर मंदिर की चौखट लांघकर पूरे गांव में फैल जाते हैं। पहले देवता की होली, फिर समाज की

यह क्रम केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन और सामूहिक सम्मान का प्रतीक है। धीरे-धीरे यह उत्सव हर आंगन तक पहुंचता है और हर घर संगीत से भर उठता है।

आपको बता दें, बैठ होली कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान है। इसमें गायक एक स्थान पर बैठकर शास्त्रीय रागों—जैसे भैरवी, काफी, कल्याण में होली गाते हैं।हारमोनियम, तबला और कभी-कभी सारंगी की मधुर संगत के साथ गाए जाने वाले ये गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना जैसे होते हैं। इन गीतों में कृष्ण-भक्ति, श्रृंगार, दर्शन और जीवन की गहरी अनुभूतियां झलकती हैं। यहां होली शोर नहीं करती, यह आत्मा से संवाद करती है।


उल्लास की जीवंत लय है खड़ी होली

खड़ी होली इसका दूसरा रंग है उल्लास और ऊर्जा से भरपूर। होल्यार टोली बनाकर ढोलक और मंजीरों की ताल पर नाचते-गाते गांव के हर घर पहुंचते हैं। उनके कदमों की थाप और गीतों की लय पूरे वातावरण को जीवंत बना देती है। जो होली गाते हैं, उन्हें होल्यार कहा जाता है। वे केवल गायक नहीं, बल्कि परंपरा के संवाहक होते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए।

हर शाम जब होल्यार किसी नए घर पहुंचते हैं, तो उनका स्वागत गुड़ और सौंफ से किया जाता है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि अपनत्व का प्रतीक है। गुड़ की मिठास और सौंफ की खुशबू जैसे रिश्तों में भी घुल जाती है। यहां होली में उग्रता नहीं, बल्कि सौम्यता है; शोर नहीं, बल्कि स्नेह है।

कुमाऊंनी होली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक तो है ही, लेकिन यह पहाड़ों की लंबी सर्दियों के अंत और नई फसल के आगमन का संकेत भी है। जब बसंत आता है, तो पेड़ों पर नई कोंपलें फूटती हैं, खेतों में हरियाली लौटती है और लोगों के चेहरों पर उम्मीद की चमक दिखाई देती है।

कुमाऊंनी होली केवल अबीर-गुलाल का खेल नहीं है। यह संगीत, संस्कृति, परंपरा और इंसानी रिश्तों का जीवंत उत्सव है। यह हर साल लोगों को जोड़ती है, दूरियों को मिटाती है और याद दिलाती है कि सादगी, प्रेम और सामूहिकता ही किसी भी समाज की असली ताकत होती है।

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