उत्तर नारी डेस्क
प्रभागीय वनाधिकारी, पौड़ी वन प्रभाग महातिम यादव की अध्यक्षता में जिला कार्यालय स्थित एनआईसी कक्ष में आगामी लीसा सत्र की तैयारियों को लेकर रेखीय विभागीय अधिकारियों की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक का उद्देश्य मार्च माह से प्रारंभ होने वाले लीसा विदोहन सत्र की पूर्व तैयारियों की समीक्षा तथा विभागीय समन्वय को सुदृढ़ करना रहा।
प्रभागीय वनाधिकारी ने कहा कि सभी उप- जिलाधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्र में वन पंचायतों के चुनाव समयबद्ध ढंग से संपन्न कराने की आवश्यकता है, ताकि लीसा विदोहन कार्य सुचारु रूप से संचालित हो सके। उन्होंने कहा कि सिविल वन क्षेत्र एवं नाप क्षेत्र में वृक्ष गणना में राजस्व कार्मिकों का सहयोग आवश्यक है, जिससे लीसा निकासी की पारदर्शी एवं व्यवस्थित प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।
महिला समूहों की भागीदारी से सशक्त होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था
उन्होंने बताया कि महिला स्वयं सहायता समूहों, महिला मंगल दलों एवं ग्रामवासियों को लीसा विदोहन का प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। विशेष रूप से नाप क्षेत्र से लीसा विदोहन में संबंधित उपजिलाधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। प्रभागीय वनाधिकारी ने कहा कि यह पहल ग्रामीणों की आर्थिकी की रीढ़ साबित हो सकती है और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन का प्रभावी माध्यम बनेगी।
उन्होंने कहा कि राजस्व एवं वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। “लापता इकॉनमी” को पुनर्जीवित करने की इस पहल में जन-जागरूकता और विभागीय सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वनाग्नि रोकथाम में भी सहायक होगी पहल
प्रभागीय वनाधिकारी ने कहा कि लीसा विदोहन में स्थानीय ग्रामीणों की निरंतर और सक्रिय भागीदारी वनाग्नि की रोकथाम में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगी।
1976 के नियमों के तहत होगा संचालन, मार्च से शुरू होगा सत्र
बैठक में वर्ष 1976 से प्रचलित लीसा विदोहन नियमों की विस्तृत जानकारी दी गई। आगामी लीसा सत्र मार्च माह से प्रारंभ हो रहा है, इसी को दृष्टिगत रखते हुए तैयारियों को अंतिम रूप देने हेतु यह बैठक आयोजित की गई। अधिकारियों ने स्थानीय स्तर पर अधिक से अधिक सहभागिता सुनिश्चित करने पर बल दिया।
पारंपरिक रील प्रणाली के साथ -साथ अपनाई जाएगी बोर होल प्रणाली
बैठक की एक महत्वपूर्ण जानकारी यह रही कि लीसा निकालने की पारंपरिक रील प्रणाली के साथ साथ अब बोर होल प्रणाली से भी लीसा निकाला जाएगा। इससे लीसा की गुणवत्ता बेहतर बनी रहेगी तथा चीड़ के पेड़ों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह प्रणाली पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी अधिक सुरक्षित मानी जा रही है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जनसहभागिता के बिना किसी भी कार्ययोजना का सफल क्रियान्वयन संभव नहीं है, इस हेतु ग्राम स्तर पर व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे।
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