तान्या रावत
यूं तो देश में देवी देवताओं के अनेक मंदिर हैं। लेकिन इसके बावजूद हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड को ही देवभूमि का दर्जा प्राप्त है, इसका कारण यह है कि यहां कई हिन्दू देवी-देवताओं का निवास स्थान है। ऋगवेद में भी उत्तराखण्ड को मनीषियों की पूर्ण कर्म भूमि कहा गया है। ऐसी भूमि जहां देवी-देवता निवास करते हैं। जिस वजह से यहां कई देवी-देवताओं के चमत्कारिक मंदिर हैं। जिस के चलते साल भर यहां सैलानियों के साथ श्रद्धालुओं का आवागमन लगा ही रहता है। हम आपको लगातार उत्तराखण्ड में बसे कई हिन्दू देवी-देवताओं के मंदिरों से रूबरू करवाते आ रहे हैं। इसी क्रम में आज हम आपको गुरु गोरखनाथ जी के मंदिर के बारे में अवगत कराएंगे। जिनका संबंध पौराणिक काल से बताया जाता है, जहां दूर-दराज से श्रद्धालु इस मंदिर में आकर अपना शीश नवाते हैं और मुराद पूरी होने पर भंडारा कराते हैं।
बता दें, पौड़ी गढ़वाल जिले के जहरीखाल ब्लॉक के अंतर्गत ग्रामसभा गजवाड़, घिल्डियाल गांव में स्थित यह मंदिर सदियों पुराना है। जिसे गुरु गोरखनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस का निर्माण सन-15 अप्रैल 1951 को किया गया था। मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को कोटद्वार से लगभग 30 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। यह लोगों की अटूट आस्था ही तो है जो उन्हें इस पवित्र धाम की ओर खींच लाती है। मान्यता है कि यहां से कोई श्रद्धालु खाली हाथ नहीं लौटा। जब किसी श्रद्धालु द्वारा सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी हुई है, तो वह मनोकामना पूरी होने पर मंदिर में आकर अपनी श्रद्धा से भंडारा करवाता है।
त्रिदिवसीय ग्रामोत्सव किया गया आयोजित
स्थानीय ग्रामीणों द्वारा बताया गया कि इस वर्ष पहली बार गांव में 23-24-25 मई को त्रिदिवसीय ग्रामोत्सव आयोजित किया गया। जबकि 26 मई गुरुवार को गुरु गोरखनाथ मेले का आयोजन हुआ। इस दौरान दूर-दराज के श्रद्धालुओं ने गुरु गोरखनाथ जी के दर्शन किए। वहीं महोत्सव में पहुंचे प्रवासी अपने पैतृक घरों को देख भावुक हो उठे। समापन अवसर पर आस-पास के क्षेत्रों से भी ग्रामीण नाचते-कूदते और भजन गाते हुये बाबा के दरबार पहुंचे। जहां बाबा के जयकारे से सम्पूर्ण आस्था धाम का माहौल भक्तिमय हो गया। इस दौरान मेला समिति ने ग्रामोत्सव में भंडारा, कीर्तन, चित्रकला प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया। ग्रामोत्सव में गांव के लोग, बेटियों व बुआओं को विशेष निमंत्रण था। वहीं, आयोजित ग्रामोत्सव के दौरान लोक गायिका रेखा धस्माना ने अपनी आवाज का जादू बिखेरा। वैसे गुरुवार को भी गुरु गोरखनाथ जी के मेले में संडे जैसा नजारा देखने को नजर आया। जहां मेले में खाने-पीने सहित खिलौनो की दुकानें भी सजाई गयी थी। वहीं लोगों ने मेले में जमकर चाट-पकौड़े का लुत्फ भी उठाया। ग्रामोत्सव के माध्यम से ग्रामसभा गजवाड़ ने पहाड़ की समृद्ध ग्राम्य संस्कृति को बचाने की जो मुहिम छेड़ी है वह सभी के लिए अनुकरणीय है। जो नई पीढ़ी को संदेश देती है कि गांव हमारी संस्कृति के केंद्र हैं और इनका संरक्षण आवश्यक है।

मंदिर के पुजारी उमेश चंद्र घिल्डियाल अनुसार " घिल्डियाल गांव में स्थित "गुरु गोरखनाथ जी का यह मंदिर सदियों पुराना है। जिस कारण इसकी काफी मान्यता है। जो भी श्रद्धालु इस मंदिर में आता है वह कभी खाली हाथ नहीं लौटा। इस धाम में आने वाले हर भक्त की मुराद पूरी होती है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि पहले यहां पौराणिक पुश्तों से गुरु गोरखनाथ जी को पशु बलि दी जाने की प्रथा चली आ रही थी, लेकिन 4, 5 सालों से हमने पशु बलि में प्रतिबंध लगा दिया है। जब से पशु बलि पर प्रतिबंध लगाया गया है, तब से सारे गांव से थोड़ा थोड़ा अनाज एकत्रित कर यहां भंडारे और श्रीफल का आयोजन किया जाता है।

वहीं इस संबंध में ग्रामीण सतीश घिल्डियाल का कहना है कि "गुरु गोरखनाथ जी का मेला हर वर्ष आयोजित किया जाता है। उन्होंने बताया कि ज्येष्ठ 10 गते की शाम को वहां मंडाण लगता है। इस दौरान काफी देवी देवताओं के नाम से रोठ बनाया जाता है, लेकिन मुख्य तौर पर गांव के गुरु गोरखनाथ जी के नाम से रोठ बनाया जाता है। साथ ही बताया कि 11 गते को गुरु गोरखनाथ जी की रोठ भेंट की पूजा होती है और 12 गते को मेला का आयोजन किया जाता है। गुरु गोरखनाथ जी के मेले के अवसर पर दूर दराज रहने वाली गांव की बहु-बेटियां और बुआओं को विशेष निमंत्रण भेज बुलाया जाता है। सतीश ने बताया कि उन्हें यह ज्ञात नहीं इस मेला का आयोजन कब से किया जा रहा है, लेकिन वह 17वें पुश्त में चल रहे है। उन्होंने बताया कि पहले पौराणिक पुश्तों से गुरु गोरखनाथ जी को पशु बलि दी जाने की प्रथा थी, लेकिन 4, 5 सालों से पशु बलि में प्रतिबंध लगा दिया गया है। अन्यथा यहाँ बहुत सारे बकरों की बलि दी जाती थी। जब से पशु बलि पर प्रतिबंध लगाया गया तब से सारे गांव से थोड़ा थोड़ा अनाज एकत्रित कर रोठ बनाया जाता है। जिसका गुरु गोरखनाथ जी को भोग लगाया जाता है।"
वहीं गांव की बेटी कविता बुड़ाकोटी ने बताया कि "गुरु गोरखनाथ जी के मंदिर की बहुत मान्यता है। यहां गुरु गोरखनाथ जी के दर्शन के लिए लोग बहुत दूर-दराज से आते है और गुरु गोरखनाथ जी के दर पर माथा टेक आशीर्वाद लेते है। उनका कहना है कि गुरु गोरखनाथ जी के मेले में लगभग 40 से 50 क्षेत्र के गॉव के लोग शामिल होते हैं। यहां से कोई खाली हाथ नहीं जाता गोरखनाथ जी सबकी मनोकामना पूर्ण करते है। कविता बुड़ाकोटी का कहना है कि यहां मेला लम्बे समय से आयोजित होता आ रहा है। लेकिन इस वर्ष पहली बार त्रिदिवसीय ग्रामोत्सव आयोजित किया गया। जिसका श्रेय उन्होंने आशुतोष घिल्डियाल जी को दिया है।"
स्थानीय ग्रामीण श्रीमती गोदांबरी देवी का कहना है कि "हमारे गांव में इस वर्ष पहली बार त्रिदिवसीय ग्रामोत्सव आयोजित किया गया। जहां सभी बहु बेटियों और बुवाओं को विशेष निमंत्रण भेज बुलाया गया। गुरु गोरखनाथ जी के मंदिर में मेले के दौरान नचायी भी की गयी और ढोल दमाऊ की थाप पर उत्सव को बड़े ही धूमधाम से मनाया गया।"